त्राटक साधना

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त्राटक एक ऐसी साधना विधि है, जो आपको शून्य में ले जाने में सहायता करती है, जो आपको आपके अस्तित्व को भुला देने में सहायता करती है, जिसके द्वारा हम प्रकृति से लयबद्ध हो सकते हैं। त्राटक विधि आतंरिक ध्यान साधना के पहले एक तरह की रिहर्सल साधना है, लेकिन इसे हलके में लेने की भूल नहीं की जा सकती। अपने आप में यह साधना विधि अत्यंत प्रचंड एवं त्रिकालदर्शी साधना है। इसी को वैदिक साहित्य में शिव का तीसरा नेत्र कहा गया है। यह साधना आपके आज्ञाचक्र को प्रभावित करती है। आज्ञाचक्र हमारे दोनों नेत्रों के मध्य थोड़ा ऊपर की और स्थित होता है , जहां महादेव शिव की तीसरी आँख का वर्णन किया गया है। इसी लिए उन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहा जाता है। जब आज्ञाचक्र प्रभावित होता है तो यह जीवन के विविध आयाम दिखाता है, विभिन्न आलौकिक अनुभूतियों से परिचित करवाता है। यहाँ मै नहीं कहूंगा की आज्ञाचक्र खुलता है, क्योंकि इसके खुल जाने की स्थिति साधारण नहीं होती एवं यदि यह खुलता भी है तो भी यह प्रकृति की दुर्लभतम घटनाओं में से एक मानी जाएगी। इसका खुलना उतना आसान नहीं होता जितना आसान अनेक लोगों द्वारा बताया जाता है। उसके खुलने हेतु कुण्डलिनी महाशक्ति की अत्यंत कठिन साधना करनी होती है, तथा मूलाधार जो कि शरीर में सबसे निचला चक्र होता है, तथा जहाँ मानव की प्रचंड शक्ति सुप्तावस्था में पड़ी रहती है, उसे ध्यान द्वारा जगाना पड़ता है, तब वह महाशक्ति उर्ध्वगामी अर्थात ऊपर की और आती हुई सभी चक्रों को भेदते हुए आज्ञाचक्र पर आती है , और तब वह चक्र खुलता है। साधारणतः आज्ञाचक्र को किसी प्रकार प्रभावित करके उसके द्वारा कुछ लाभ ही लिए जा सकते हैं, क्योंकि आज्ञाचक्र खुलने पर व्यक्ति अपने शरीर को छोड़कर कहीं भी आ-जा सकता है, किसी भी व्यक्ति, वस्तु अथवा पदार्थ का ज्ञान प्राप्त कर सकता है, जो एकदम असाधारण घटना होती है, सामान्यतः त्राटक द्वारा आज्ञाचक्र प्रभावित कर लेने मात्र से भी असाधारण अनुभव प्राप्त किए जा सकते हैं। त्राटक द्वारा हमें भविष्य और भूत की धुंधली अनुभूतियाँ स्वप्नों आदि के माध्यम से होने लगती है, अच्छे- बुरे व्यक्ति का आभास हो सकता है, किसी घटना का आभास होने लगता है, परम शांति का अनुभव होने लगता है, अपनी साँसों की ध्वनि सुनाई देने लग सकती है, अशरीर अर्थात शरीर नहीं होने का भाव जागने लग सकता है, परम एकाग्रता प्राप्त हो सकती है तथा यह एकाग्रता इतनी तीव्र हो सकती है कि हम किसी असंभव से लगने वाले कार्य को भी पूरा कर दें। तब आत्मविश्वास इतना बढ़ जाता है कि हमें किसी को भी नियंत्रित कर लेने का सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है जो कि भौतिक जीवन में बड़े काम की चीज़ है। त्राटक साधना विभिन्न प्रकार से की जा सकती है। इसमें सबसे ज्यादा प्रचलित साधना अग्नि त्राटक है। अग्नि को एकटक देखने की क्रिया त्राटक कहलाती है। एकटक देखने से अभिप्राय है कि बिना कुछ सोचे-समझे या विचारे बस पागलों की तरह अग्नि को ताकते रहो। इसके लिए एक तेल का दीपक जला कर अपने से २ से ३ फ़ीट दूर रख कर एकदम अँधेरे कमरे में अथवा एकदम सुनसान अँधेरे स्थल पर बैठ जाइये तथा केवल दीपक की जलती लौ को देखते रहिये, और विचारों को मारने के लिए केवल साँसों पर ध्यान देते रहिये, आप कुछ महीनों में पाएंगे कि दीपक की लौ में एक अलग ही किस्म का आकर्षण उत्पन्न हो जाएगा, आप उसके भीतर तक देख सकने में सक्षम हो जाएंगे, तब आप शून्य में पहुँच जाएंगे, लेकिन आपको विचार कुछ नहीं करना है, बस देखते रहना है। इस तरह दीपक को प्रतिदिन एक नियत समय पर ताकते रहें और विचारों को मन में ना आने दें। बहुत लोग कहते हैं कि दीपक की लौ को लगातार देखना है। यह एक गलत विचारधारा है, इस प्रकार आँखों को क्षति हो सकती है, आप अपनी सामर्थ्यानुसार लौ को देखते रहिये और पलक झपक भी जाए तो कोई नुकसान नहीं। हमें तो सिर्फ विचार शून्य होना है चाहे साधन कुछ भी हो। इस प्रकार धीरे धीरे आप प्रतिदिन के प्रयासों से शीघ्र ही शून्य में पहुंचने के क़रीब हो जाएंगे तथा आपको अनेक आलौकिक अनुभूतियाँ भी होनी प्रारम्भ हो जाएंगी। और इस बारे में अधिक जानने के लिए आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं। शीघ्र ही मै अन्य विधियों को भी आपके सम्मुख प्रकाश में लाऊंगा। मै आशा करता हूँ आपको यह लेख पसंद आया होगा।

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अबाउट Thakur

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